(It is the collection of immotions,love with nature,concept of poverty,truth,)
Thursday, June 19, 2008
प्रेम-पुष्प
प्रिये,
कभी देखा है तुमने
सूखते हुये घास
और मुरझाते हुये प्रभात को
कितने बेवस नज़र आते हैं वे
समझ लो वही हो गया हूँ आजकल
कहते हैं न- दीये में तेल डालते ही
उसके जलने की तमन्ना और बढ़ जाती है
मेरी भी आरज़ूयें बढ़ने लगी हैं
नहीं सोच पाता क्या होगा अंजाम
कब गिरेंगी दीवारें
कब बनेगा संगमरमरी ताजमहल
कब जायेगी सड़क दिल के इस छोर से
उस छोर तक
मैं तो चल पड़ा हूँ
इस राह में तुम्हारे सहारे
बहुत से चौराहों को लाँघ भी लिया है
न जाने इतना साहस कहाँ से आ गया है
लोग ठीक कहते थे
किसी का साथ हो तो
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सागर की सीमा
आकाश की ऊँचाई
और पाताल की गहराई
भी नापी जा सकती है
लड़खड़ाने लगे हैं कदम मेरे
पर इस डगमगाहट में भी मज़ा है
प्रयास करता हूँ न देखूँ स्वप्न
न जाऊँ समय से आगे
पकड़ा रहूँ हाथ वास्तविकता का
पर रहता है कहाँ होश
कहाँ दबते हैं ज़ज्बात
अब तो शाम-ओ-सहर
यादों की दरिया में गोता लगा रहा हूँ
कभी डूबता भी हूँ
और कभी उतरता भी हूँ
शायद तुम तिनकों की मानिन्द
बहती रहती हो, बहती रहती हो
ताकि जब मैं डूबने लगूँ
तो तुम मुझे उबार सको।
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hindi kavya
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2 comments:
अच्छी रचना. आगे भी निरंतर उम्मीद की जाती है. शुभकामनायें.
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उल्टा तीर
हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.
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